प्रदूषण क्या हैं, प्रकार एवं ध्वनि प्रदूषण की परिभाषा

प्रकृति के समस्त जैविक व अजैविक तत्व वातावरण को संतुलित बनाए रखते हैं। पृथ्वी पर जीवन के विकास का क्रम व्यवस्थित रूप से चलता रहता है।

जब वातावरण में किसी एक तत्व की मात्रा अधिक हो जाती है या कम हो जाती है तो अन्य तत्वों पर इसका हानिकारक प्रभाव पड़ता है। जिस कारण हमारा वातावरण दूषित हो जाता है।

वातावरण के दूषित होने से जैविक क्रिया में बाधा उत्पन्न होने लगती है। इससे मानव प्रगति पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है तथा प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक जीवन को क्षति पहुंचती है।

जब पर्यावरण के तत्व जैसे जल, वायु तथा भूमि आदि किसी हानिकारक पदार्थों से मिलकर अपने जैविक गुणों में परिवर्तन लाते हैं तो उनका उपयोग मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बन जाता है। जैविक क्रियाओं की यह असंतुलित व्यवस्था ही प्रदूषण कहलाती हैं।

हमारा वातावरण कई कारकों के कारण प्रदूषण होता है जिनमें से एक ध्वनि प्रदूषण है जिसका आज हम इस अध्याय में संपूर्ण रूप से अध्ययन करेंगे –

सामान्य रूप से जो हम अपने कानों से सुनते हैं उसे ध्वनि कहते हैं। कुछ ध्वनियां मधुर एवं दिल को चुने वाली होती है जबकि कुछ ध्वनियां हमें परेशान कर देती है। प्रत्येक व्यक्ति एक स्तर की ध्वनि को सहजता से स्वीकार कर लेता है लेकिन तेज ध्वनि को सहन नहीं कर पाता है।

गलत समय एवं गलत स्थान पर गलत ध्वनि को शोर या ध्वनि प्रदूषण के रूप में व्यक्त किया जाता है अर्थात् जब कोई अवांछित ध्वनि मनुष्य की गतिविधियों पर विपरीत प्रभाव डालती है तो ध्वनि प्रदूषण कहलाती है।
ध्वनि को डेसीबल में मापा जाता है।

सामान्यतया एक व्यक्ति 70 – 80 डेसीबल की ध्वनि सहन कर सकता है। इससे अधिक माप की आवाज शोर कहलाती है।

(1) ध्वनि प्रदूषण के स्रोत –

ध्वनि प्रदूषण के मुख्यतः दो कारण है –
(i) प्राकृतिक कारण (ii) कृत्रिम कारण

(i) प्राकृतिक कारण – प्राकृतिक स्रोतों जैसे बादलों को गर्जन, बिजली की गडगडाहट, तेज बरसात, तूफानी हवाएं, झरनों की आवाज, ज्वालामुखी, भूकंप का आना, पत्थरों का टूटना और वन्य जीवों की आवाजें आदि प्राकृतिक ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।

(ii) कृत्रिम कारण – कृत्रिम साधनों में मानवीय सुविधाएं व मनोरंजन के साधन सम्मिलित हैं। जिनके कारण ध्वनि प्रदूषण होता है।

इनमें से प्रमुख कारण निम्न प्रकार हैं

(a) उद्योग धन्धे – उद्योग-धन्धों में संचालित होने वाले यंत्र ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। लघु उद्योगों से हस्तचलित यंत्रों को ध्वनि निकलती है।
प्रिंटिंग प्रेस, कारखाने, हथकरघा, छपाई, लुहारी के उद्योगों से लेकर वृहतकाय उद्योग जैसे लोहे एवं इस्पात के कारखाने, सोमेन्ट उद्योग, बलाई के कारखाने, ऑटोमोबाइल उद्योग, कपड़ा व धागा बनाने के कारखाने आदि बड़ी माश में ध्वनि प्रदूषण उत्पन करते हैं ।

(b) यातायातय के साधन – रेलगाड़ियों का शोर, इंजन की मिट्टी, ट्रक-बसों से उत्पन्न ध्वनि, स्कूटर, कार, मोटर साइकिल, वायुयान, इंजन चलित नौकाएं तथा यातायात के अन्य साधन बड़ी मात्रा में शोर उत्पन्न करते हैं।

(c) लाउडस्पीकर – लाउडस्पीकर से तेज गानों की आवाज, चुनावों के समय लाउडस्पीकर्स के द्वारा भारी ध्वनि उत्पन्न होना, ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। सभा मंचों पर , मंदिर – मस्जिदों तथा उत्सवों पर लाउडस्पीकर बजाकर ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न किया जाता है।

(d) सामूहिक मनोरंजन के कार्यक्रम – सामुहिक मनोरंजन के कार्यक्रम जैसे नाच, गाने, संगीत, नाटक, डिस्को डांस वाले नाईट क्लब, उत्सव, बारात आदि सभी कार्यक्रमों द्वारा बहुत शोर उत्पन्न होता है ।

(2) ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव –

ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव मानव के मस्तिष्क व कार्य क्षमता पर अधिक पड़ता है।
ध्वनि प्रदूषण से निम्न दुष्प्रभाव पड़ते हैं –

1. ध्वनि प्रदूषण से मानसिक तनाव बढ़ता है व कार्य करने की क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

2. निरन्तर शोर में कार्य करने से व्यक्ति की सुनने की शक्ति कम हो जाती है।

3. ध्वनि प्रदूषण से हृदय गति बढ़ जाना, ब्लड प्रेशर में परिवर्तन के कारण सिरदर्द, चक्कर आना जैसी बीमारियां हो जाती हैं।

4. शोर से नींद में बाधा आती है जिससे चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, एवं अन्य रोगों का हमारे शरीर में जन्म होता है।

5. अधिक शोर के कारण तेज बोलने से स्वर तन्त्रों में सूजन आ जाती है व गले में दर्द होता है।

(3) ध्वनि प्रदूषण रोकने के उपाय –

ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं-

1. ध्वनि प्रदूषण के कारण एवं उसके दुष्परिणामों की जानकारी जनता को देकर उन्हें जागरूक किया जाना चाहिए। इस जानकारी से ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है।

2. घरों में रेडियो, टी.वी. आदि की आवाज पर नियंत्रण रखना चाहिए, स्वयं धीरे स्तर में बोलना, अपने वाहनों में साइलेन्सर आदि का प्रयोग करना चाहिए।

3. घरों में होने वाले सांस्कृतिक, वैवाहिक व धार्मिक कार्यों में उज कम रखना, आदि उपायों से ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण किया जा सकता है।

4. कल – कारखानों को बस्ती से बाहर स्थापित किया जाना चाहिए। कारखानों में शोर नियंत्रित उपकरणों का इस्तेमाल हमेशा किया जाना चाहिए।

5. मशीनों के सही रख – रखाव से शोर कम किया जा सकता है। शोर के समीप कार्य करने वाले कर्मचरियों को कान के बन्दक ( Earmufts ) का उपयोग करना चाहिए।

6. विद्यालयों में बच्चों को ध्वनि प्रदूषण की जानकारी देकर उनके व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन किया जा सकता है।
उन्हें धीमी आवाज में बोलने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

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